अपनी ही कीर्ति को malign करती, होश खोये घूमते हैं,
फिर ज्ञान का दीपक जला कर, दुर्गा और वाल्मीकि बनते हैं.

समझ मेरे इस पवित्र ज्ञान को,
तेजोमय इस अनंत सूर्य को.

तुझे संवारने मै आया हूँ ,
साथ मेरे प्रज्ञा लाया हूँ .

जाग मेरी काली, तेरा शिव तेरे नीचे,
इतना चाहे तुझे, फिर भी तू सुध-बुध मीचे.
बैठ मेरे साथ, कर विपस्सना,
होगी तू दुर्गा और तारा, नष्ट होगी वासना .

जागृत तुम होगी, पवित्र (पारवती) आप होगी ,
अपने शिव (मंगल) को खुद जानोगी.
सीख विपस्सना, तप करोगी,
कीर्तिमुक्त कर खुद से खुद को, अपने शिव को पाओगी,
मुक्त हो जाओगी, मुक्त हो जाओगी.

मंगल हो !
_/!\_
-Tejsing Gaikwad
Mumbai
July 19, 2013: 1250hrs

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